अनुकूलता :
मुख्या रूप से अनुकूलन का लक्ष्य जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए उनकी क्षमता में सुधार कर लोगों की संवेदनशीलता को कम करना है। अनुकूलन क्षमता अक्सर सीमित होती है, विशेष रूप गरीब ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लोगों का जीवन यापन कृषि से होता है। समुदायों को जलवायु परिवर्तन से संबंधित जानकारी और नए अनुकूलन नीतियों के साथ उपलब्ध कराया जाना चाहिए और मौजूदा क्षमता , संपत्ति और संसाधनों में उपायों को एकीकृत किया जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन को समझना जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन के अल्पकालिक और दीर्घकालिक प्रभाव पर जानकारी आवश्यक है ताकि किसान विभिन्न नीतियों और उपायों का उपयोग कर सकें।
सब्जियों को बांस की जाली से ढकना :

तापमान स्थिति में परिवर्तन के साथ , कीट व्यापकता और कीड़े का प्रकोप बढ़ जाता है। सब्जी की खेत नियमित तौर पर कीटों और विस्तारित सूखे की स्थितियों से तबाह होते हैं। छोटे जमीन वाले किसान बांस के जाल अवरोधकों का प्रयोग कर सरल तकनीक से इस समस्या का मुकाबला कर सकते है। उपलब्ध बांस के साथ सरल मच्छरदानि का प्रयोग से कीड़ों कीटों का प्रबंध किया जा सकता है और कृषि योग्य भूमि वाले क्षेत्र की सूक्ष्म-जलवायु परिस्थितियों को भी बनाए रखते हैं।

वर्षा के मौसम से पहले जोतना :

रोपण तिथि का समायोजन का फसल कैलेंडर में बदलाव तापमान के को कम करने और उपज को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। बरसात के मौसम से पहले रोपण वर्षा जल से प्राप्त मिट्टी की नमी को उपयोग के लिए अधिक प्रभावी बनाता है

मल्चिंग :

सांस्कृतिक अभ्यास,मल्चिंग, अक्सर सब्जियों की खेती में अनुशंसित होती है । मल्च पौधों के चारों ओर रखी पत्तियों या पुआलों का एक सुरक्षात्मक कवर होता है। फसलों पर शुष्क पत्तियों को फैलाने से संक्रमण की वजह से पानी के नुकसान को नियंत्रित किया जाता है।

भारी वर्षापात के कारण फसलों को गिरने से रोकने के लिए सहारा देने के उद्देश्य से छड़ी, बेंत या लकड़ियां लगाना :

भारी और अघोषित वर्षा , तेज हवा और अन्य विपरीत मौसम स्थिति अनेपक्षित स्थितियों का परिणाम हो सकता हैं। भारी वर्षा के कारण गिरने से खड़ी फसल को बचाने के लिए सरल और सांस्कृतिक तरीका सहयोह के लिए डंडे रखना होगा।

अवशिष्ट नमी :

छोटे वर्षाकाल वाले शुष्क क्षेत्रों की कुछ मिट्टियों में फसलें वर्षा का मौसम समाप्त होने से कुछ दिन पहले और यहां तक कि वर्षा समाप्त होने या रुकने के बाद भी रोपी जाती हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि मिट्टी में जमी नमी का लाभ लिया जा सके। टेपरी सेम की फसल इसी सिद्धांत का उपयोग करके उगाई जाती है। तरबूज-खरबूज का ऐसी फसलों के रूप में प्रायः उपयोग किया जाता है।

रोपण घनत्व :

सीमित या कम नमी अथवा आर्द्रता के कारण यह आवश्यक हो जाता है कि कतारों के बीच दूरी अधिक चौड़ी और बोने या बीज डालने की दर कम रखी जाए, उसकी तुलना में जो बहुत अधिक नमी वाले क्षेत्रों में रखी जाती है। इसके परिणामस्वरूप पौध संख्या कम हो जाती है जिससे प्रत्येक पौधे को नमी और पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में सुलभ होते हैं और इस प्रकार आपूर्तियां समाप्त होने से पहले फसल के पकने की संभावना बढ़ जाती है।

फसलों की सूखा प्रतिरोधक प्रजातियों का रोपण :

सूखा बहुल क्षेत्रों में और अधिक सूखा प्रतिरोधक फसलों पर बल देने से जलवायु परिवर्तन के प्रति वध्यता या कमजोरी को कम करने में मदद मिल सकती है। उदाहरण के लिए,

  • शुष्क मौसम के चावल की तुलना में गेहूं को सिंचाई के लिए बहुत ही कम पानी की आवश्यकता होती है।
  • चना और अरहर जैसी जलवायु-चतुर फसलें शुष्क तथा अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के छोटी जोत के किसानों की मौसम के बदलावों का सामना करने में सहायता करती हैं। इनके लिए पानी की कम आवश्यकता होती है, ये मिट्टी को समृद्ध करती हैं और पोषक तत्त्वों से भरपूर होती हैं।  

सीधे बोए गए चावल की खेती :

सीधे बोए गए चावल की खेती में पौधों की रोपाई के लिए नर्सरी या पौधा-घर उगाने से छुटकारा मिल जाता है। मॉनसून में देरी या पानी की कमी की स्थिति में इससे किसानों को इतना लचीलापन या मोहलत मिल जाती है कि वे बचे हुए मौसम के अनुरूप अलग-अलग उपयुक्त अवधि के साथ धान की सीधी बुआई कर सकें। सीधे बोया गया चावल अत्यधिक पानी में बोए गए चावल की तुलना में कम पानी की खपत करता है। सिंचाई के पानी का पंप चलाने के लिए ऊर्जा की मांग भी कम होती है।

खेती की एकीकृत प्रणालियां :

बाढ़ बहुत तथा मौसम में अत्यधिक बदलाव वाले क्षेत्रों में सामान्य रूप से एक फसल ली जाती है। इन वध्य या संवेदनशील क्षेत्रों में किसानों का एकल खेत उद्यम पर निर्भर रहना जोखिम से भरा होता है, क्योंकि इससे जलवायु की बाध्यताओं का सामना करने का उनका लचीलापन सीमित हो जाता है। खेती की एकीकृत प्रणालियों के तरीके में जहां भी व्यवहार्य हो वहां एक उद्यम घटकों के निर्गतों का दूसरे संबंधित उद्यमों के आगतों के रूप में उपयोग करना शामिल है। उदाहरण के लिए, पशुओं के गोबर को फसलों के अवशेषों और खेती के कचरे के साथ मिलाकर पोषक तत्त्वों से भरपूर वर्मी-कम्पोस्ट में बदला जा सकता है।

सिंचाई दक्षता में सुधार :

सूखा बहुल क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलता की सफलता ताजे पानी की उपलब्धता पर निर्भर करती है। चूंकि पानी प्रतिबंधक कारक बन जाता है, इसलिए सिंचाई दक्षता में सुधार विशेष रूप से सूखे मौसम में एक महत्त्वपूर्ण अनुकूलन साधन बन जाएगा, क्योंकि शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई के तौर-तरीके बहुत अधिक पानी सघन होते हैं।