कृषि वानिकी का अर्थ है अन्य कृषि फसलों और पशुओं के साथ पौधों, पशुओं, लोगों और पर्यावरण को लाभ पहुंचाने वाले पेड़ों को उगाना। इसमें कृषि और वानिकी की प्रौद्योगिकियों को एक साथ मिलाकर अधिक विविधतापूर्ण, उत्पादक, लाभदायक, स्वस्थ और टिकाऊ भू-उपयोग प्रणालियों का निर्माण किया जाता है।
मृदा संरक्षण और रेत के टीलों के स्थिरीकरण के लिए वृक्षों के उपयोग के अच्छे परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। इन पद्धतियों में वासभूमि क्षेत्रों और गृह उद्यानों के चारों ओर वुडलॉट अर्थात वनभूमि के टुकड़ों, रक्षात्मक झाड़ियों और हरी-भरी बाड़ें लगाना शामिल है। वृक्षों की खाद्य और अखाद्य दोनों प्रजातियों का उपयोग किया जा सकता है, जिनमें चारा देने वाले वृक्षों की प्रजातियां और ईंधन तथा निर्माण सामग्री के लिए लकड़ियां देने वाले वृक्ष भी शामिल हैं। कृषि वानिकी प्रणाली में जलवायु परिवर्तन से होने वाली असामान्यताओं से लड़ने की क्षमता और संभावना है।
उपयुक्त कृषि वानिकी प्रणालियों का चयन सामान्य रूप से विद्यमान पद्धतियों, जलवायु, मृदा की स्थितियों, मिट्टी के क्षरण के स्तर, पशुधन संख्या, चरागाहों की उपलब्धता, घर-परिवारों की खाद्य आपूर्ति और पोषण तथा जलावन या ईंधन के लकड़ियों की आवश्यकता के आधार पर किया जाता है। क्षेत्र की जिन विशेषताओं का ध्यान रखना होता है, उनमें भूमि का बढ़ता अवक्रमण, भूमि की घटती वहन क्षमता, बढ़ती शुष्कता, बढ़ता तापमान और हवाओं की प्रबलता शामिल हैं।
सुझाए गए उपाय नीचे लिखे अनुसार हैं :
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वास उद्यान और बगीचे : इस पद्धति में छोटे-छोटे फलों के बगीचे लगाना या घरेलू उद्यानों में नानाविध सब्जियों के साथ अंतर-रोपित अलग-अलग फलों के पेड़ों को छितराए हुए ढंग से रोपना शामिल है। राजस्थान की ऊष्ण और शुष्क जलवायु को सहन कर सकने वाली फल प्रजातियों में लसूढ़ा/लसोड़ा (इंडियन चेरी), भारतीय आलूबुखारा या बेर और वन्न/खब्बार शामिल हैं। |
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सुरक्षापट्टी: इन्हें पवनरोधक या वातरोधी भी कहा जाता है। शरणपट्टी वृक्षों या झाड़ियों की एक या अधिक कतारों से मिलकर बना वृक्षारोपण होता है जिसमें पेड़ों या झाड़ियों को इस प्रकार लगाया जाता है ताकि वे हवा से रक्षा कर सकें और मिट्टी के क्षरण को रोक सकें। यह मिट्टी की नमी को बढ़ाने में मदद करती है और साथ ही खेतिहर पशुओं से सुरक्षित रोक भी प्रदान करती है। |
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झाड़ियों की रोक और हरी-भरी बाड़ : निचली समतल भूमियों में घुसपैठ या अतिक्रमण बड़ी भारी समस्या है और इसलिए वासभूमियों के चारों ओर झाड़ियों की रोक या हरी-भरी बाड़ लगाने की सलाह दी जाती है, जो विशेष रूप से गांव के भीतर रखे गए पशुधन से सुरक्षा के लिए कारगर होती है। |
खेत या कृषि भूमि में मेड़ की पट्टियों पर चारा बैंक/वृक्ष : यह पद्धति उन क्षेत्रों में अधिक उपयोगी है जहां चराई के संसाधन बहुत कम हैं। शुष्क और अर्ध-शुष्क भूमियों में 50 प्रतिशत से अधिक बायोमास या जैवभार का उत्पादन पत्तियों और पेड़ों तथा झाड़ियों की खाई जा सकने वाली टहनियों से मिलकर बनता है। यहां तक कि अपेक्षया अधिक वर्षापात वाले क्षेत्रों में, जहां घास जुगाली करने वाले पशुओं द्वारा खाए जाने वाले मृदा जैविक पदार्थ के बड़े भाग की पूर्ति करती है, पेड़ों की पत्तियां और फल विशेष रूप से जुगाली करने वाले छोटे पशुओं के लिए आहार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं। ये पेड़ घासदार वार्षिक या सदाबहार चारा फसलों के बीच कतारों में अंतर-फसल के रूप में लगाए जा सकते हैं। |
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पेड़ और झाड़ियां लगाकर रेत के टीलों का स्थिरीकरण : रेत के टीलों की सतह पर उपयुक्त वनस्पति लगाने के परिणामस्वरूप सतह वायु की गति कम होती है, अपरदन या बुहार की गतिविधि रुकती है और मिट्टी की स्थिति में सुधार आता है, जो अंततः उस क्षेत्र की सूक्ष्म जलवायु स्थितियों में सुधार की ओर ले जाता है। टीलों पर उगाई जाने वाली सामान्य घासें हैं : अ) मरम्म घास, ब) लाइम घास। सामान्य झाड़ियां हैं : अ) फोग, ब) झार्बर, स) रेगिस्तानी लौकी। |


