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मेड़ पट्टीदार खेती
- रोपी गई क्यारियां मेड़ के ढलान से सीधी खड़ी लंबी रेखा में होती हैं।
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एक पट्टी में एक बार गैर-क्षरण प्रतिरोधक फसल बोकर और अगली बार उसी पट्टी में क्षरण-प्रतिरोधक फसल बोकर पट्टी को बारी-बारी से बदलना बेहतर होता है।
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ज्वार और बाजरा जैसे अनाजों के लिए मेड़ की पट्टी की सबसे अच्छी और प्रभावी चौड़ाई 21.6 मीटर है और बीच के फलीदार पौधों के लिए 7.2 मीटर है।
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पवन पट्टीदार खेती
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ऊंचाई : वायुरोधक कोट के तौर पर फसल की ऊंचाई महत्त्वपूर्ण है क्योंकि फसल जितनी अधिक ऊंची होगी, वायुरोधक के रूप में उतने ही अधिक क्षेत्र में उसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा।
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लंबाई : वातरोधक फसलों की क्यारियां उतनी ही लंबी होना चाहिए जितनी लंबी क्यारियों की हवा से रक्षा करने की आवश्यकता है।
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घनत्व : वैकल्पिक फसलों की एक के बाद एक व्यस्थित सीधी और लंबी, किंतु अपेक्षया संकरी और समानांतर पट्टियां बिछाई जानी चाहिए।
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स्थान : मेड़ चाहे जैसी हो, उस पर ध्यान दिए बिना प्रचलित हवा की चारों दिशा में फसलें रोपी जाती हैं।
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उपयोग की जाने वाली प्रजातियां : कम ऊंचाई तक बढ़ने वाली फसलों के बीच में ज्वार, बाजरा और मक्का जैसी ऊंची बढ़ने वाली फसलें लगाई जानी चाहिए।
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स्थायी या अस्थायी बफर पट्टीदार फसल उगाना
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मेड़ पट्टीदार खेती के अंतर्गत स्थायी या अस्थायी बफर अर्थात प्रतिरोधक पट्टीदार खेती में खेतों में अत्यंत गंभीर अर्थात तीव्र या अत्यधिक क्षरित हो चुकी ढलानों का ध्यान रखते हुए पट्टियां बनाई जाती हैं।
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ऊंचाई : बफर या प्रतिरोधक पट्टी के रूप में रोपी गई फसल की ऊंचाई अधिक ऊंची हो सकती है क्योंकि इसका उपयोग वायुरोधक के रूप में किया जा सकता है।
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लंबाई : बफर या प्रतिरोधक फसलों की क्यारियां उतनी ही लंबी होनी चाहिए जितनी फसलों की क्यारियों की रक्षा करने की आवश्यकता है।
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स्थान : फसलें मेड़ की दिशा के चारों ओर रोपी जाती हैं।
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उपयोग की जाने वाली प्रजातियां : सामान्य रूप से सदाबहार फलियां, घासें या झाड़ियां स्थायी या अस्थायी आधार पर रोपी जाती हैं।
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