यह क्या है?
पट्टीदार खेती

यह मिश्रित फसल उगाने का ही उन्नत रूप है, जिसमें खेत को लंबी और संकरी पट्टियों में बांटकर खेती की जाती है। इच्छित फसलें अपेक्षया संकरी पट्टियों में उगाई जाती हैं और इन्हें क्षरण प्रतिरोधक फसलों की पट्टियों से पृथक किया जाता है। पट्टीदार फसल उगाने में खेती की कई अच्छी पद्धतियों को अपनाया जाता है, जिनमें बारी-बारी से फसल बदलना, परिरेखा या मेड़ खेती, समुचित जुताई, ठूंठ घासपात से ढकना, आवरण खेती, इत्यादि शामिल हैं।    

पट्टीदार फसल उगाने के विभिन्न रूप इस प्रकार हैं :
मेड़ पट्टीदार खेती – इसमें मेड़ या परकोटे की ढलानों पर बारी-बारी से उपयुक्त चौड़ाई की दो पट्टियों में फसल उगाई जाती है जिनमें से एक पट्टी में खुली मिट्टी और क्षरण होने देने वाली फसलें उगाई जाती हैं जबकि उससे अगली पट्टी में मिट्टी की रक्षा करने वाली और क्षरण रोकने वाली फसलें उगाई जाती हैं।
पवन पट्टीदार खेती – इसमें मेड़ चाहे जैसी हो, उसका ध्यान रखे बिना प्रचलित हवा की दिशा के हिसाब से बिछाई गई बारी-बारी से व्यवस्थित सीधी और लंबी, किंतु अपेक्षया संकरी, समानांतर पट्टियों में फसलें उगाई जाती हैं जिनमें से एक पट्टी में ज्वार, बाजरा या मक्का जैसी ऊंची बढ़ने वाली फसलें और उसकी बगल की अगली पट्टी में कम ऊपर बढ़ने वाली फसलें उगाई जाती हैं।
स्थायी या अस्थायी बफर अर्थात प्रतिरोधक पट्टीदार खेती – मेड़ पट्टीदार खेती के अंतर्गत स्थायी या अस्थायी बफर अर्थात प्रतिरोधक पट्टीदार खेती में खेतों में अत्यंत गंभीर अर्थात तीव्र या अत्यधिक क्षरित हो चुकी ढलानों का ध्यान रखते हुए पट्टियां बनाई जाती हैं। इसमें वैसी बारी-बारी से पट्टियां नहीं बनाई जातीं जैसी सामान्य पट्टीदार खेती में बनाई जाती हैं और इनमें स्थायी या अस्थायी आधार पर सामान्य रूप से सदाबहार फलियों, घासों या झाड़ियों वाली पौधे लगाए जाते हैं।